ममता ने हुगली कोर्ट में लड़ी थी इंसाफ की लड़ाई
कोलकाता। सियासत के पन्नों में कुछ तस्वीरें ऐसी दर्ज हो जाती हैं, जो दशकों बाद भी उतनी ही जीवंत लगती हैं। बुधवार को जब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सफेद साड़ी और काली शॉल लपेटे देश की सर्वोच्च अदालत में पार्टी-इन-पर्सन (स्वयं याचिकाकर्ता) के रूप में दलीलें पेश कर रही थीं, तो हुगली के बुजुर्गों को 29 साल पुराना वह मंजर याद आ गया, जब ममता ने एक वकील के रूप में चुंचुड़ा जिला अदालत में मोर्चा संभाला था। यह वाकया जुलाई 1997 का है। बंगाल की तपती गर्मी और रथयात्रा का उत्साह तब मातम में बदल गया था, जब हुगली के गुप्तिपाड़ा में रथ के मार्ग को लेकर हुए विवाद में पुलिस ने गोलीबारी कर दी थी। इस घटना में हलधर मंडल और बुड़ो बाग नामक दो लोग घायल हुए थे, जिनमें से हलधर की मृत्यु हो गई थी। तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य के गृह मंत्रालय के अधीन काम कर रही पुलिस कथित तौर पर शव का जबरन अंतिम संस्कार चुंचुड़ा में ही करना चाहती थी, जिसका मृतक के परिजनों ने कड़ा विरोध किया। 7 जुलाई 1997 को उस समय की तेजतर्रार विपक्षी नेता ममता न केवल पीडि़त परिवार के साथ खड़ी हुईं, बल्कि उन्होंने वह किया जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। योगेश चंद्र लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री हासिल कर चुकीं ममता ने अपना काला गाउन निकाला और चुंचुड़ा जिला जज कोर्ट में वकील के रूप में प्रवेश किया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उस दिन अदालत में ममता बनर्जी ने एक पेशेवर वकील की तरह तार्किक दलीलें पेश की थीं ताकि मृतक के शव को सम्मानजनक तरीके से उसके गांव ले जाने की अनुमति मिल सके। आज करीब तीन दशक बाद, मंच बदल चुका है और मुद्दा भी। बुधवार को वे एक परिवार के लिए नहीं, बल्कि बंगाल के करोड़ों मतदाताओं के हक के लिए निर्वाचन आयोग के एसआईआर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में खड़ी थीं। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ के सामने उन्होंने जिस आत्मविश्वास के साथ मतदाता सूची में विसंगतियों और मृत घोषित किए गए जीवित मतदाताओं का पक्ष रखा, उसने उनके पुराने वकील अवतार की याद ताजा कर दी। हुगली के गुप्तिपाड़ा रथ कमेटी के सदस्यों का कहना है कि ममता बनर्जी का संघर्ष चाहे सड़क पर हो या अदालत में, उनका तेवर आज भी वही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी कई बार ममता यह कह चुकी हैं कि वे आज भी प्रैक्टिस कर सकती हैं क्योंकि वे मूल रूप से एक वकील हैं। बुधवार की अदालती कार्यवाही ने यह साबित कर दिया कि सत्ता के शिखर पर होने के बावजूद, ममता बनर्जी के भीतर का वह कानून का छात्र और जनहित की लड़ाई लडऩे वाला वकील आज भी पूरी तरह सक्रिय है।